चिंचवड़: पिंपरी-चिंचवड़ के परिचित निजी अस्पतालों में से एक निरामय हॉस्पिटल एक बार फिर कर्ज वसूली से जुड़े विवाद के कारण कार्रवाई का सामना कर रहा है। बुधवार को सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो में अस्पताल परिसर में अधिकारी मौजूद दिखाई दे रहे हैं और पुलिस सुरक्षा के बीच सीलिंग की प्रक्रिया किए जाने की बात कही जा रही है।
इस कार्रवाई के पीछे निरामय हॉस्पिटल और LIC Housing Finance के बीच लंबे समय से चल रहा कर्ज विवाद है। पहले सामने आई जानकारी के अनुसार, अस्पताल ने 2015 में नई इमारत के निर्माण के लिए LIC Housing Finance से करीब ₹71 करोड़ का मॉर्गेज लोन लिया था।
अस्पताल के निदेशक डॉ. किसन मुंडे ने पहले कहा था कि 2022 के अंत तक किस्तों के जरिए करीब ₹65 करोड़ की रकम चुकाई जा चुकी थी। बाद में आर्थिक कठिनाइयों के कारण भुगतान प्रभावित हुआ। अस्पताल प्रबंधन का कहना था कि LIC Housing Finance द्वारा बताई जा रही आगे की बकाया राशि से वह सहमत नहीं है और इसी कारण मामला अदालत तक पहुंचा।
Debt Recovery Tribunal में LIC Housing Finance के पक्ष में प्रक्रिया आगे बढ़ने के बाद अस्पताल की गिरवी संपत्ति का कब्जा लेने की कार्रवाई शुरू हुई। इससे पहले अस्पताल को नए मरीज भर्ती न करने, पहले से भर्ती मरीजों को दूसरे अस्पतालों में शिफ्ट करने और परिसर खाली करने के निर्देश दिए जाने की खबर भी सामने आई थी। इसके बाद अस्पताल प्रबंधन ने Bombay High Court से राहत मांगी।
यह मामला केवल कर्ज वसूली तक सीमित नहीं रहा है। कार्रवाई के पहले चरण में अस्पताल प्रबंधन ने बताया था कि करीब 30 गंभीर मरीज ICU में इलाज करा रहे थे, जबकि अस्पताल में 400 से अधिक कर्मचारी काम कर रहे थे।
सोशल मीडिया पर अस्पताल के समर्थन में बड़ी संख्या में प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कई लोगों ने कहा है कि निरामय हॉस्पिटल ने वर्षों से इलाके के मरीजों को सेवा दी है और अस्पताल को अपनी स्थिति सुधारने के लिए समय मिलना चाहिए। कुछ लोगों ने यह भी चिंता जताई है कि अस्पताल बंद होने से मरीजों के साथ-साथ डॉक्टरों, नर्सों और अन्य कर्मचारियों पर भी असर पड़ेगा।
दूसरी ओर, LIC Housing Finance की कार्रवाई कर्ज वसूली से जुड़ी कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है। इसलिए बकाया राशि और संपत्ति के कब्जे से जुड़े अंतिम सवालों का समाधान अदालत और संबंधित कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से ही होगा।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि कानूनी प्रक्रिया जारी रहते हुए मरीजों का इलाज अचानक प्रभावित न हो और जरूरी स्वास्थ्य सेवाएं बाधित न हों। अब सभी की नजर इस बात पर है कि अस्पताल प्रबंधन, कर्जदाता और संबंधित प्रशासन किसी व्यावहारिक समाधान तक पहुंचते हैं या नहीं।









